एच-1बी वीजा फीस वृद्धि और ट्रंप का गोल्ड कार्ड प्लान: भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए बड़ी चुनौती और मौका

एच-1बी वीजा फीस वृद्धि और ट्रंप का गोल्ड कार्ड प्लान: भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए बड़ी चुनौती और मौका
डोनाल्ड ट्रंप ने H1B वीजा की फीस बहुत अधिक बढ़ा दी है (File Photo: Reuters)

नई दिल्ली, 22 सितंबर 2025: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H1B वीजा पर बढ़ाई गई फीस ने भारत के आईटी पेशेवरों के अमेरिकन ड्रीम को बड़ी चुनौती में डाल दिया है। ट्रंप प्रशासन ने 'गोल्ड कार्ड स्कीम' के तहत H1B वीजा की फीस को करीब एक लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) तक बढ़ा दी है, जिसके चलते अब अमेरिका में काम करने के लिए भारतीय पेशेवरों का रास्ता और मुश्किल हो गया है। इस फैसले का भारत की आईटी कंपनियों और स्टार्टअप्स पर गहरा असर पड़ने की आशंका है।

अमेरिका की बढ़ती सख्ती और उनका तर्क

हर साल हजारों भारतीय H1B वीजा के तहत अमेरिका में काम करने जाते रहे हैं, जिससे वहां भारतीयों की मौजूदगी बढ़ने के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचा। अमेरिकी कंपनियों में काम करने वाले भारतीय पेशेवर विदेशों में कमाई (रेमिटेंस) भारत भेजते थे और जब वे वापस आते थे, तो अपने साथ तकनीकी कौशल भी लाते थे। लेकिन अब ट्रंप सरकार का मानना है कि H1B वीजा का दुरुपयोग हो रहा है और इससे अमेरिकी नौकरियां खतरे में पड़ रही हैं। यही वजह है कि वीजा के नियम और कोटा, दोनों पर सख्ती बढ़ चुकी है।

व्हाइट हाउस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2003 में H1B पेशेवरों के पास 32% आईटी नौकरियां थीं, जबकि 2025 तक यह आंकड़ा 65% से भी ज्यादा होने का अनुमान है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि 'गोल्ड कार्ड' जैसे विकल्पों से अमेरिका अब दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली और कुशल लोगों को ही अपने देश में बुलाना चाहता है, ताकि उन्हें लंबे समय तक अमेरिका में बनाए रखा जा सके।

कंपनियों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति इतना मूल्यवान है कि कंपनी सरकार को हर साल एक लाख डॉलर दे, तभी उसे अमेरिका में काम करने की अनुमति मिल सकती है। उन्होंने कहा, "यहीं इमिग्रेशन का असली मकसद है। अमेरिकियों को नौकरी पर रखें और यह सुनिश्चित करें कि अमेरिका में आने वाले लोग शानदार टैलेंट वाले हों।"

AionOS के संस्थापक सीपी गुरनानी ने कहा है कि पिछले कई सालों में भारतीय आईटी कंपनियों ने H1B वीजा पर अपनी निर्भरता 50% से कम कर दी है और आवेदनों में भी 50% से ज्यादा की गिरावट आई है। उनके अनुसार, यह बदलाव स्थानीय स्तर पर अधिक नियुक्तियां करने, ऑटोमेशन में निवेश और वैश्विक डिलीवरी मॉडल में सुधार की रणनीति का नतीजा है।

भारत के लिए मौका या चुनौती?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत के लिए दोहरी चुनौती और मौका दोनों है। गोल्ड कार्ड की वजह से भारत के टेक्निकल पेशेवरों की घर वापसी की संभावना बढ़ रही है। इंडस्ट्री के जानकारों के अनुसार, विदेशी कंपनियों ने अब आव्रजन संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में ही मजबूत ऑपरेशन मॉडल तैयार किए हैं। कई भारतीय आईटी फर्में पहले ही H1B पर निर्भरता 50% से कम कर चुकी हैं।

हार्वर्ड लॉ स्कूल और कार्नेगी मेलॉन के पूर्व फेलो विवेक वाधवा ने इस फैसले को अमेरिका के लिए 'आर्थिक आत्महत्या' बताया है। उनका कहना है कि इससे अमेरिका में काम कर रहे भारत के टैलेंटेड लोग अपना कौशल, बचत और वैश्विक अनुभव लेकर स्वदेश लौटने पर मजबूर होंगे। वाधवा के मुताबिक, इस विपरीत प्रवाह से भारत को लंबे समय में बेहद फायदा हो सकता है, क्योंकि वे पूंजी, नेटवर्क और वैश्विक संचालन का ज्ञान लेकर आएंगे।

भविष्य की दिशा

इंडस्ट्री के जानकार गणेश नटराजन ने कहा कि अमेरिका में पहली बार नौकरी करने वाले छात्रों और पेशेवरों के लिए 'अमेरिकन ड्रीम' अब केवल दूर का सपना रह गया है। उनका मानना है कि अगर यह नियम लागू रहा, तो प्रतिभा मॉडल में बड़ा बदलाव आएगा और भारत जैसे देशों को लंबी अवधि में फायदा हो सकता है, हालांकि इसमें कुछ साल लग सकते हैं।

ऐसे में, यह समय है जब भारत सरकार और कंपनियों को मिलकर स्थानीय अवसर बढ़ाने होंगे। विशेषज्ञों की मानें तो भारत अब खुद को ग्लोबल टेक हब के रूप में स्थापित करने की ओर बढ़ सकता है, जिससे देश की आईटी प्रतिभा को वैश्विक मान्यता और अवसर प्राप्त हो सकेंगे।